प्रिय पाती
August 28, 2006 by shipsag
तुम जा रही हो ,उनके पास ,
प्रिय पाती !
बताना ,उनको वो बातें ,जो मैं नही बताती|
बताना, कैसे शब्दों को पिरोया है मैंने, भावों में,
वाक्य-रचना नहीं मुझे आती|
बताना, कैसे अभ्यास नहीं, मुझे लिख्ने का ,
इसलिए शब्दों को रही घुमाती|
बताना, कैसे मेरी उँगलियाँ चलती रही ,रात भर,
उनके एह्सास से ,मेरी सारी थकन रही जाती|
बताना, कैसे स्वप्न देते रहे दस्तक ,
और मैं उन्हें , मीठी झिङकी दे सुलाती |
बताना, कैसे दीवार घङी ,घन्टे रही बजाती,
रात खत्म हुई, इससे पहले कि मैं लिख्नना बन्द कर पाती|
बताना, कैसे मैंने ,तुम्हे डराया समझाया
नहीं तो, तुम सबसे मेरी चुगली कर जाती|
बताना, कैसे मेरे अधरों ने, तुम्हे छू लिया ,
इससे पहले कि मैं तुम्हे लिफाफे मेँ डाल पाती|
बताना, कैसे लिखने को कितना कुछ याद आता रहा रात भर,
इससे पहले कि सुबह हो और तुम डाक-बक्सें में जा पाती|
बताना, बहुत कुछ बचा है, अभी कहने को,
काश! तुम उन्हें सब समझा पाती|
तुम जा रही हो, उनके पास ,
प्रिय पाती !
बताना, उनको वो बातें ,जो मैं नही बताती |
शिल्पा जी,
आपकी कविता में भावनाओं का अद्भुत चित्रण है|
एक विरहन का प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति का सामंजस्य अत्यन्त मधुर रूप मे उपस्थित है|
एक सुन्दर रचना के लिए बहुत बधाई|
आगे भी आपकी लेखनी से ऐसी ही कविताएँ निकलती रहें, यही कामना है|