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Archive for September, 2006

मच्छर गाथा

एक दिन यूँ ही टहलते हुए, हम घर से थोङा दूर आ गये| कहीं एक कोने में बारिश का पानी इकट्ठा हो गया था| वहीं कुछ मच्छरों ने अपनी चौपाल सजा रखी थी| जाने हमें भी क्या सूझी, हम वहीं खङे होकर उनका वार्तालाप सुनने लगे| (ये विचित्र विधा हमने कैसे सीखी ये फिर कभी [...]

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मेरी माँ

नये ज़माने के रंग में,
पुरानी सी लगती है जो|
आगे बढने वालों के बीच,
पिछङी सी लगती है जो|
गिर जाने पर मेरे,
दर्द से सिहर जाती है जो|
चश्मे के पीछे ,आँखें गढाए,
हर चेहरे में मुझे निहारती है जो|
खिङकी के पीछे ,टकटकी लगाए,
मेरा इन्तजार करती है जो|
सुई में धागा डालने के लिये,
हर बार मेरी मनुहार करती है जो|
तवे से उतरे हुए ,गरम [...]

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पिघल रहा था वो बादल,
निचोङ अपने हर अंश को,
बरखा की निखरी सी बूंदों में|
ढल रहा था उसका अस्तित्व,
उनींदी सी कोमल कलियों का,
यौवन सँवारने में|
जी उठे थे सूखे पात,
सौन्धी हो गयी थी मिट्टी ,
बुझा अपनी प्यास भीगी बरसात में|
असीमित ,निर्बाध, गगन को,
जब फैला हथेली देख रही थी मैं ,
लदी थी वो बारिश की बूँदो से|
बून्दें जो [...]

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मानसून

धरती गाती जा रही है,नये तराने |
इठलाने के ढूँढ,नित नये बहाने |
सोती है गीतों को रख,अपने सिरहाने |
लगी अबूझ पहेलियाँ,यों ही सुलझाने|
नहीं किसी से वो अब,कभी हार माने,
लगे पराये उसे ,सब जाने-अजाने
क्योंकि बरसों की प्रेम-क्षुधा बुझाने,
सूखे पातों पर हरे रंग की तूलिका चलाने,
चटख  आवरण से उसका आँचल सजाने,
दिन आये उसका रोम-रोम मानसून की पहली बारिश [...]

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मीठा एहसास

खिङकियो के जंगले पर,
हौले से इधर -उधर झाँकती है|
मेरे आँगन की चटाई पर बैठ ,
 मेरा हाथ बँटाती है|
बरामदे की क्यारियों में,
चुपके से फूलों से बाते कर जाती है|
घर के दरवाजों पर चढ- चढ,
आङी- तिरछी सूरत बनाती है|
कोने में रखी सुराही से,
सारा पानी पी जाती है|
मेरे गीले बालों में रुकी बून्दों को,
चोरी से साथ ले जाती [...]

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घरौंदा

जाना है हमें सूरज के घर,
अपने घरौंदे के लिये उजाला लाने को|
पूछना है पंछियों से तिनकों का पता,
अपना आशियाँ बनाने  को|
करनी  है चाँद की चिरौरी,
चाँदनी को अपने घर बुलाने को|
तकनी है सितारोँ की राह ,
अपने स्वप्नों के घरौंदे को सजाने को|
चलना है थकन की पगडण्डियों पर,
चौबारे के बरगद की छाँव पाने को|
हाँ , जाना होगा [...]

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