पिघल रहा था वो बादल
September 13, 2006 by shipsag
पिघल रहा था वो बादल,
निचोङ अपने हर अंश को,
बरखा की निखरी सी बूंदों में|
ढल रहा था उसका अस्तित्व,
उनींदी सी कोमल कलियों का,
यौवन सँवारने में|
जी उठे थे सूखे पात,
सौन्धी हो गयी थी मिट्टी ,
बुझा अपनी प्यास भीगी बरसात में|
असीमित ,निर्बाध, गगन को,
जब फैला हथेली देख रही थी मैं ,
लदी थी वो बारिश की बूँदो से|
बून्दें जो थी जीवन बादल का,
बून्दें जो हैं जीवन अब सूखे पातों का,
बन्द हैं मेरी मुट्ठी में|
अब जब आसमान रंगा है,
इन्द्रधनुष के सप्तरंगों में,
वहीं ठगी सी खङी हूँ मैं,इस सोच में ….
क्या है इनका अस्तित्व,
बादल, बूँद,सूखे पात , फूल का रंग,
झरने का यौवन ,या चातक पक्षी की प्यास……
…..या सिर्फ मौसम की करवट
…..या प्रकृति की अनूठी मुस्कान|
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