मेरी माँ
September 21, 2006 by shipsag
नये ज़माने के रंग में,
पुरानी सी लगती है जो|
आगे बढने वालों के बीच,
पिछङी सी लगती है जो|
गिर जाने पर मेरे,
दर्द से सिहर जाती है जो|
चश्मे के पीछे ,आँखें गढाए,
हर चेहरे में मुझे निहारती है जो|
खिङकी के पीछे ,टकटकी लगाए,
मेरा इन्तजार करती है जो|
सुई में धागा डालने के लिये,
हर बार मेरी मनुहार करती है जो|
तवे से उतरे हुए ,गरम फुल्कों में,
जाने कितना स्वाद भर देती है जो|
मुझे परदेस भेज ,अब याद करके,
कभी-कभी पलकें भिगा लेती है जो|
मेरी खुशियों का लवण,मेरे जीवन का सार,
मेरी मुस्कुराहटों की मिठास,मेरी आशाओं का आधार,
मेरी माँ, हाँ मेरी माँ ही तो है वो|
माँ को प्रणाम
माँ ,
तुम्हारी वंदना में अर्पित
ये सारा जीवन है |
तुम्हारा स्नेह पाने को तो
तरसते सारे देवगण हैं|
माँ पर बहुत अच्छी पंक्तियाँ लिखी हैं आपने !
डा. रमा द्विवेदी said
मां से बढ कर संसार में और कोई दौलत नहीं है।
Hats off..
आपका ब्लोग लिंक किया है.. औरों को पढाना चाहता हूं..
शुक्रिया..
[...] – शिल्पा अग्रवाल [...]
माँ ,कैसे व्यक्त करूँ तूझे .
आपकी रचना हृदय को छू जाने वाली है.
beautiful.. ur words are just amazing girl…
keep writing
zameh