नये ज़माने के रंग में,
पुरानी सी लगती है जो|
आगे बढने वालों के बीच,
पिछङी सी लगती है जो|
गिर जाने पर मेरे,
दर्द से सिहर जाती है जो|
चश्मे के पीछे ,आँखें गढाए,
हर चेहरे में मुझे निहारती है जो|
खिङकी के पीछे ,टकटकी लगाए,
मेरा इन्तजार करती है जो|
सुई में धागा डालने के लिये,
हर बार मेरी मनुहार करती है जो|
तवे से उतरे हुए ,गरम फुल्कों में,
जाने कितना स्वाद भर देती है जो|
मुझे परदेस भेज ,अब याद करके,
कभी-कभी पलकें भिगा लेती है जो|
मेरी खुशियों का लवण,मेरे जीवन का सार,
मेरी मुस्कुराहटों की मिठास,मेरी आशाओं का आधार,
मेरी माँ, हाँ मेरी माँ ही तो है वो|
माँ को प्रणाम
माँ ,
तुम्हारी वंदना में अर्पित
ये सारा जीवन है |
तुम्हारा स्नेह पाने को तो
तरसते सारे देवगण हैं|
माँ पर बहुत अच्छी पंक्तियाँ लिखी हैं आपने !
डा. रमा द्विवेदी said
मां से बढ कर संसार में और कोई दौलत नहीं है।
Hats off..
आपका ब्लोग लिंक किया है.. औरों को पढाना चाहता हूं..
शुक्रिया..
[...] – शिल्पा अग्रवाल [...]
माँ ,कैसे व्यक्त करूँ तूझे .
आपकी रचना हृदय को छू जाने वाली है.
beautiful.. ur words are just amazing girl…
keep writing
zameh
एक मा के दिल की भावनाओ को शब्दों में उतारना जज्बात भरी बात होती है जो एक सच्चे मा और बेटा ही समक्ष सकते हैं एक- दूसरे की दिल का बात