ऐसी भी क्या दिल्लगी
October 18, 2006 by shipsag
हमारे एक मित्र Entomologist हैं, अर्थात कीट-विज्ञान शास्त्री|एक दिन उनसे मिलने के लिये हम उनकी लैबोरटरी में पँहुच गये|डेंगू जैसी बीमारी फैलाने वाले जीव के विषय में जानने की इच्छा प्रकट करने पर उन्होने हमें एक किस्सा सुना कर टरका दिया| हमने सोचा ज्ञान नही बाँट सकते तो क्या वो किस्सा ही आपको सुना देते हैं|
एक स्लाइड पर एक मच्छर की निष्प्राण काया को रख हमारे मित्र जाने किस ख्याल में डूबे हुए थे|
हमने उन्हे चेताया , अरे भाया, इस तुच्छ मच्छर ने सारे भारत में है आतंक फैलाया, इतने पर भी उन्हें कुछ समझ में ना आया, और उन्होने उस मच्छर का दुखङा हमें कुछ यों सुनाया, जिसे सुन हमें भी बेचारे मच्छर की किस्मत पर रोना आया| तो किस्सा कुछ यों है–
कालेज में मलेरिया ,डेंगू ,कालेरा जब पढा रहे थे लेक्चरार|
उसी समय बेचारे मच्छरजी की मक्खीजी से आँखें हो गयी चार|
इश्क का चढा तेज़ बुखार और दोनो हो गये इक-दूजे के बीमार|
डेटिंग पर अब कहाँ जाया जाए, इस पर किया दोनो ने विचार|
मुनिसिपल्टी के नाले या,पार्क के गड्ढो में किया जाये विहार|
मैकडोनल्ड के कच्ररेदान में खाया, प्रेम से फास्ट-फूड का आहार|
सोचा रिश्ता अटूट हो जाए, अब ये, विवाह को बना आधार|
कुण्डली मिली तो, झट,मच्छर पण्डित को प्रकट किया आभार|
शुभ मुहूर्त की तारीख तय हुई,और दिन तय हुआ सोमवार|
सज-धज कर आयी मक्खी,तन- मन से उसने किया श्रिंगार|
महक रही थी वो ऐसे, जैसे साथ लायी हो अपने नयी बहार|
अँखियों में लक्मे का काजल लगा,छोङ रही थी तीर वो एक हज़ार|
पर हाय रे किस्मत! पास आते ही हुए धराशायी मच्छर जी हमार|
खोज-बीन की तो पता चला हमको इसका विचित्र कारण यार|
डिओडोरेंट ना मिला तो मक्खीजी ने ओडोमास क्रीम लगाई बार-बार|
और महकने के लिये,बेचारे मच्छरजी पर कर दिया अनजाने में वार|
इसलिये कहत हैं बछुवा ,काहू को ना चढे ऐसन प्रीत का बुखार|
बेचारे मच्छरवा की खातिर रोवत है दिल बार-बार, ज़ार-ज़ार हमार|
प्रेम होता हैं अंधा भैये, मख्खी का चैन हैं छीना
हो सके तो समझाना उसको,
डेगुं, मलेरीया से अच्छा हैं विधवा बन कर जीना.
हा हा
बहुत मज़ेदार किस्सा है
मैं तो कहूं इसे भारत के गाऊँ गाऊँ मे पढ कर सुनाया जाए
बढ़ियां है.
डा. रमा द्विवेदी….
अब का कहूं बहुत नीकी प्रेमगाथा रचिब है।यह दिल्लगी नहीं दिल की लगी है।
hahha nice bohat badiya likhe ho shilp
maza aay gaya guru dev
Bhut hi adbhut maan gae aapki caturmuki pratiba ko silpa ji ………. kya kahe koi kavi ya lekhak itna jada vo bhi alag 2 visyo par likh sakta hai maine to soch bi na tha…… wakai aapki pratibha ko salam