कुछ पुरानी किताबों के पन्ने
March 23, 2007 by shipsag
बरसों बाद खुले,कुछ पुरानी किताबों के पन्ने|
उम्र के बोझ तले,पीले साँचे में ढले,
पन्ने कुछ अधखुले,आज यों खुले,
सूखे गुलाबों की बासी खुशबू समेटे,
वक्त से पिछङ,कल को आज में लपेटे,
कागज़ के मुङे- तुङे पुर्जे छुपाये हुए,
जाने कितने राज़ सीने में दबाये हुए,
भीगे मौसमों की स्याही फैलाये हुए,
अश्कों के निशां गालों पर सजाये हुए,
बरसों बाद खुले कुछ पुरानी किताबों के पन्ने|
शिल्पा जी,
आपका शब्द-शिल्प तो अद्भुत है। किन्तु ये पुरानी किताबों के पन्ने खोलने की अचानक से क्या सूझी?
इसे पढ़कर मेरा भी मन करता है कि कुछ लिखूँ इन पुरानी किताबों पर,
“आज बरसों बाद जब मैंने खोले वो स्याह पन्ने,
और तो कुछ न मिला याद बिसरी मिल गयी।
अब वापस उन यादों के साये में जीने का मन करता है।”
aaccha laga yeh kavita padkar..chand kavitae eshi hoti hain jo ki side dil me utlati hain..apki kavita bhi unhi chand kavitao me se ek hain..
एक शेर याद आता है… “अबके बिछ्ड़े तो शायद ख्वाबों में मिले, जैसे सूखे फ़ूल हमें किताबों में मिले…”
अच्छी लगी कविता.. यादों के बंद पन्ने खोलती हुई…
मान्या जी, अतुल जी ,आशीष जी और आदित्य जी उत्साह-वर्धन के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद|
Ek or sirf ek baat kahooga ki mai bhi ek lekhak hoo kabhi kabhi likhta hoo , par jab maine aapki padhi to mai raat bhar sochta raha ki kitni gahri soch hai aapki…………..
ye mere jeewan ka sabse bada sobhagya hai ki mai aap jaisi likhika ki krati padh saka………….
abhishek
अच्छा लिखा है आपने !