निराले रंग
March 27, 2007 by shipsag
रंग भी बहुरूपिये से रंग बदलते हैं,
कभी चटख, कभी बदरंग लगते है|
पुरानी किताब की नयी ज़िल्द में,
बन-ठन कर कितना इतराते हैं|
माँ की सन्दूक की साडियों में,
तहों के बीच फीके से लगते हैं|
पन्ना दर पन्ना अखबार में,
खबरों में बिन-बात ही उलझते हैं|
बारिश में धुल गयी दीवारों में,
चौबारे के साथ गीत गुनगुनाते हैं|
दरवाज़ों पर उग आये कुकुरमुत्तों में,
मुण्डेर की काई से कोने में झगडते हैं|
नुक्कड की बूढी दादी के सिंगार में,
माथे की कुमकुम बन चमकते हैं|
यादों की चादर में लगे नये पैबंद में,
मूक रह कर भी कहानी गढते हैं|
रंग भी बहुरूपिये से रंग बदलते हैं,
कभी चटख, कभी बदरंग लगते है|
सुन्दर कविता।
बढ़िया है!! लिखते रहें.