किरणों की लेखनी चला,
लिख देता है, रोज़ दिन नया दिवाकर्,
सागर की चंचल लहरों पर|
सुनहरी रोशनाई से अलंकृत कर,
लहरों के अल्हङ शैशव को,
तरुणाई की सीमा-पार ले जाता है|
दिखलाता है दिन नया,
सुनहरे अम्बर का दर्पण,
और जाते हुए, दे जाता है,
ऊर्जा किनारों पर चोट करने की….
ऊर्जा अपने अस्तित्व को पाने की….
Archive for August, 2007
किरणों की लेखनी से
Posted in drishti on August 10, 2007 | Leave a Comment »