सुलझी कभी, कभी अनसुलझी पहेली बन जाता है,
जब मुट्ठी खोल कर यों ही बंद कर जाता है|
कानों में काँच की चूङी सा खनक जाता है,
जब बिन बात यों ही तू खिलखिलाता है|
कोठरी के रोशनदान सा चमक जाता है,
जब झप से झप-झप आँखें झपकाता है|
बचपन के मायने दीवारों पर समझाता है,
जब हथेलियों से उन पर निशान [...]
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नन्ही सी छाँव
Posted in rishte on September 17, 2008 | 1 Comment »