Feed on
Posts
Comments

मेरी माँ

नये ज़माने के रंग में,
पुरानी सी लगती है जो|

आगे बढने वालों के बीच,
पिछङी सी लगती है जो|

गिर जाने पर मेरे,
दर्द से सिहर जाती है जो|

चश्मे के पीछे ,आँखें गढाए,
हर चेहरे में मुझे निहारती है जो|

खिङकी के पीछे ,टकटकी लगाए,
मेरा इन्तजार करती है जो|

सुई में धागा डालने के लिये,
हर बार मेरी मनुहार करती है जो|

तवे से उतरे हुए ,गरम फुल्कों में,
जाने कितना स्वाद भर देती है जो|

मुझे परदेस भेज ,अब याद करके,
कभी-कभी पलकें भिगा लेती है जो|

मेरी खुशियों का लवण,मेरे जीवन का सार,
मेरी मुस्कुराहटों की मिठास,मेरी आशाओं का आधार,
मेरी माँ, हाँ मेरी माँ ही तो है वो|

पिघल रहा था वो बादल,
निचोङ अपने हर अंश को,
बरखा की निखरी सी बूंदों में|

ढल रहा था उसका अस्तित्व,
उनींदी सी कोमल कलियों का,
यौवन सँवारने में|

जी उठे थे सूखे पात,
सौन्धी हो गयी थी मिट्टी ,
बुझा अपनी प्यास भीगी बरसात में|

असीमित ,निर्बाध, गगन को,
जब फैला हथेली देख रही थी मैं ,
लदी थी वो बारिश की बूँदो से|

बून्दें जो थी जीवन बादल का,
बून्दें जो हैं जीवन अब सूखे पातों का,
बन्द हैं मेरी मुट्ठी में|

अब जब आसमान रंगा है,
इन्द्रधनुष के सप्तरंगों में,
वहीं ठगी सी खङी हूँ मैं,इस सोच में ….
क्या है इनका अस्तित्व,
बादल, बूँद,सूखे पात , फूल का रंग,
झरने का यौवन ,या चातक पक्षी की प्यास……

…..या सिर्फ मौसम की करवट
…..या प्रकृति की अनूठी मुस्कान|

मानसून

धरती गाती जा रही है,नये तराने |
इठलाने के ढूँढ,नित नये बहाने |
सोती है गीतों को रख,अपने सिरहाने |
लगी अबूझ पहेलियाँ,यों ही सुलझाने|
नहीं किसी से वो अब,कभी हार माने,
लगे पराये उसे ,सब जाने-अजाने

क्योंकि बरसों की प्रेम-क्षुधा बुझाने,
सूखे पातों पर हरे रंग की तूलिका चलाने,
चटख  आवरण से उसका आँचल सजाने,
दिन आये उसका रोम-रोम मानसून की पहली बारिश में भिगाने
जून -जुलाई की तारीखें अब वो क्या जाने,
मेघ्रराज को बना सारथी,
निकल पडी है वो तो अपने सावन को पाने|

मीठा एहसास

खिङकियो के जंगले पर,

हौले से इधर -उधर झाँकती है|

मेरे आँगन की चटाई पर बैठ ,

 मेरा हाथ बँटाती है|

बरामदे की क्यारियों में,

चुपके से फूलों से बाते कर जाती है|

घर के दरवाजों पर चढ- चढ,

आङी- तिरछी सूरत बनाती है|

कोने में रखी सुराही से,

सारा पानी पी जाती है|

मेरे गीले बालों में रुकी बून्दों को,

चोरी से साथ ले जाती है|

पङोसियों की कनखियों का,

जब-तब आसरा बन जाती है|

तितलियों की अठखेलियों को,

नयी दिशा दे जाती है|

ताज़ा धान की पूलियों को,

भीनी-भीनी खुशबू दे जाती है|

ईख के खेतों से गुज़र कर,

गुङ की मिठास साथ लाती है|

कपास के सफेद फूलों को ,

इठलाता रंग दे जाती है|

सरसों की फसल के बीच से,

पीले कपङे पहन कर आती है|

मटर के हरे दानों से,

ताज़गी का सिंगार कर आती है|

साँझ ढले चिङियों से,लौटते हुए ,

जाने क्या कह जाती है|

मेरे उदास गालों को,

कभी-कभी प्यार से सहला जाती है|

हाँ! जाङे की धूप किसी अपने के,

प्यार भरे आलिंगन का

मीठा एहसास दे जाती है|

घरौंदा

जाना है हमें सूरज के घर,
अपने घरौंदे के लिये उजाला लाने को|

पूछना है पंछियों से तिनकों का पता,
अपना आशियाँ बनाने  को|

करनी  है चाँद की चिरौरी,
चाँदनी को अपने घर बुलाने को|

तकनी है सितारोँ की राह ,
अपने स्वप्नों के घरौंदे को सजाने को|

चलना है थकन की पगडण्डियों पर,
चौबारे के बरगद की छाँव पाने को|

हाँ , जाना होगा किरणों के रथ पर चढ,
अपने आँगन में खुशियों की धूप लाने को|

तुम जा रही हो ,उनके पास ,
प्रिय पाती !
बताना ,उनको वो बातें ,जो मैं नही बताती|

बताना, कैसे शब्दों को पिरोया है मैंने, भावों में,
वाक्य-रचना नहीं मुझे आती|

बताना, कैसे अभ्यास नहीं, मुझे लिख्ने का ,
इसलिए शब्दों को रही घुमाती|

बताना, कैसे मेरी उँगलियाँ चलती रही ,रात भर,
उनके एह्सास से ,मेरी सारी थकन रही जाती|

बताना, कैसे स्वप्न देते रहे दस्तक ,
और मैं उन्हें , मीठी झिङकी दे सुलाती |

बताना, कैसे दीवार घङी ,घन्टे रही बजाती,
रात खत्म हुई, इससे पहले कि मैं लिख्नना बन्द कर पाती|

बताना, कैसे मैंने ,तुम्हे डराया समझाया
नहीं तो, तुम सबसे मेरी चुगली कर जाती|

बताना, कैसे मेरे अधरों  ने, तुम्हे छू लिया ,
इससे पहले कि मैं तुम्हे लिफाफे मेँ डाल पाती|

बताना, कैसे लिखने को कितना कुछ याद आता रहा रात भर,
इससे पहले कि सुबह हो और तुम डाक-बक्सें में जा पाती|

बताना, बहुत कुछ बचा है, अभी कहने को,
काश! तुम उन्हें सब समझा पाती|

तुम जा रही हो, उनके पास ,
प्रिय पाती !
बताना, उनको वो बातें ,जो मैं नही बताती |

« Newer Posts