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नन्ही सी छाँव

सुलझी कभी, कभी अनसुलझी पहेली बन जाता है,
जब मुट्ठी खोल कर यों ही बंद कर जाता है|

कानों में काँच की चूङी सा खनक जाता है,
जब बिन बात यों ही तू खिलखिलाता है|

कोठरी के रोशनदान सा चमक जाता है,
जब झप से झप-झप आँखें झपकाता है|

बचपन के मायने दीवारों पर समझाता है,
जब हथेलियों से उन पर निशान बनाता है|

दिन भर लुका-छिपी का खेल दोहराता है,
जब पर्दे के पीछे अनजाने ही छुप जाता है|

मिट्टी और पौधे का रिश्ता बन जाता है,
जब आकर गोद में मेरी तू सो जाता है|

कङी धूप में नन्ही सी छाँव सा बन जाता है,
जब बिन बोले ही तू मुझको माँ कह जाता है|

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किरणों की लेखनी से

किरणों की लेखनी चला,
लिख देता है, रोज़ दिन नया दिवाकर्,
सागर की चंचल लहरों पर|

सुनहरी रोशनाई से अलंकृत कर,
लहरों के अल्हङ शैशव को,
तरुणाई की सीमा-पार ले जाता है|

दिखलाता है दिन नया,
सुनहरे अम्बर का दर्पण,
और जाते हुए, दे जाता है,
ऊर्जा किनारों पर चोट करने की….
ऊर्जा अपने अस्तित्व को पाने की….

थोङी और हरियाली

एक क्यारी में कच्ची सी,
एक पौधा लगा दिया है

जो पावस की बूँदों को,
नन्हीं पत्तियों में समेटता है

झोंकों से हवाओँ के,
लङता कभी, कभी झगङता है

किरणों की पीली छटा में,
अलसाता कभी, कभी निखरता है

ताल को बारिश की,
राग मल्हार समझ थिरकता है

दरारों में मिट्टी की,
अपने भावी आकार बुनता है

पर भूरी उदासी को मिटाने को,
थोङी और हरियाली के स्वप्न रचता है

ताज़ा खबर

बन गयी मिसेज बच्चन, कल मिस राय,
कह कर पुराने आशिकों को टाटा -बाय-बाय,
जाने कितनों के सीनों पर खंजर चलाए,
जिन्होने बाल्टी भर-भर आँसू बहाए|

जुगल जोडी के दर्शन की आस लगाए,
प्रतीक्षा करती रही पब्लिक टकटकी लगाए,
और संवाद-दाता अडे रहे डेरा जमाए|

जो मिली किसी को कोई फालतू खबर,
हर चैनल बार-बार वही दोहराए|
किसने किस रंग की साडी पहनी,
किसने कितने जाम छलकाए,
बिना रुके समाचार वाचक सारा दिन यही चिल्लाए,
ना तो वो भीतर का लाइव टेलिकास्ट दिखाएँ,
ना क्या चल रहा है दुनिया में, गलती से ये ही सुनाएँ,
बोर होकर बताइये फिर क्यों ना मन झल्लाए?

फिर भी पाने को एक झलक, रहे टीवी में नज़रें गडाए

हाल देखकर दुनिया के दीवानेपन का,
प्रश्न एक दिल में मेरे बार- बार आए,
क्यों अब्दुल्ला दीवाना, बेगानी शादी में हुआ जाए?

कभी किसी बिछङे से पूछो,

कभी किसी बिछङे से पूछो,
कैसे घर की याद सताती है|

बारिश में सौन्धी हुई मिट्टी,
मन भीतर तक गीला कर जाती है|

तस्वीरों में जो बचपन थोङा बाकी है,
यादें उसकी अब भी गुदगुदाती हैं|

बाज़ार में सजी कोई फुलकारी,
दूर अपने देस ले जाती है|

कभी किसी बिछङे से पूछो,
कैसे घर की याद सताती है|

खुशियाँ दिलासा देने जब,
कभी-कभार दस्तक दे जाती हैं,

दादी-काकी, मामी – नानी,
कहाँ बलाएँ लेने आती हैं|

धुन हर गीत की पुराने
गली के नुक्कङ तक पँहुचाती है|

कभी किसी बिछङे से पूछो,
कैसे घर की याद सताती है|

महकता हुआ रजनीगँधा हर,
घर के आँगन में ले चलता है|

पर दीवाली का दीया भी यहाँ,
सप्ताहांत को तरसता है|

लौटेगा तू कब घर अपने,
मन बार-बार ये प्रश्न करता है|

कभी किसी बिछङे से पूछो,
कैसे घर की याद सताती है|

अजनबी देस में, यहाँ- वहाँ,
रिश्तों की तलाश की जाती है|

जाने खुद से ये आँख-मिचौली,
अभी कितने बरस बाकी है|

पहचान कहीं गुम गयी है,ये गुत्थी
क्या खोया,क्या पाया सुलझ नहीं पाती है|

कभी किसी बिछङे से पूछो,
कैसे घर की याद सताती है|

बारिश में सौन्धी हुई मिट्टी,
मन भीतर तक गीला कर जाती है|

आज सडक पर हम चलते जा रहे थे | अचानक हमारी नज़र सडक के किनारे अनमने और उदास से बैठे एक शिखाधारी, दीन-हीन से दिखने वाले प्राणी पर जा टिकी | जाने क्यों हमें लगा कि हो ना हो ये कोई जाना-पहचाना बुद्धिजीव है | पास जाकर ऐसा लगा कि, इससे तो ऐसा लगता है बचपन में कई बार मिल चुके हैं, परंतु स्मृति की गठरी लाख खंगालने के बाद भी समझ नही आया कि वो भलामानुष आखिर है कौन |

आखिरकार हमने उन्ही के पास जाकर विनम्रतापूर्वक पूछ लिया,” हे महापुरुष क्या आप इस तुच्छ प्राणी को अपना परिचय देने का कष्ट करेंगे ?” ऐसा सुनकर वो कुछ अचकचाये, फिर ये सोचकर कि प्रश्न शायद उनकी ओर इंगित ना हो, उन्होने इधर-उधर झाँका, परंतु इधर-उधर किसी को ना देखकर वो एक उत्साह भरी मुस्कान चेहेरे पर लाकर बोले कि “चलो इस इलेक्ट्रॉनिक युग में किसी ने तो मुझे पहचाना | मेरा नाम तेनालीराम है,राजा कृष्णदेव राय के यहाँ मंत्री हुआ करता था, एक समय में बच्चे बडे चाव से मेरे किस्से पढते-सुनते थे पर आजकल किसी के पास फुर्सत कहाँ | स्कूल के होमवर्क का दस मन का बोझ निपटाने के बाद जो समय बचता है वो कार्टून नेटवर्क के सामने बैठकर ही बीत जाता है | और जो अगर थोडा समय बच जाता है वो प्ले-स्टेशन और एक्स-बॉक्स के खाते में चला जाता है |बच्चों की मम्मियों को किट्टी पार्टी से फुर्सत नहीं और पापा बेचारे तो रोज़ी -रोटी और नये ब्राण्ड की गाडी के चक्कर में ही पिसे जाते हैं, दादा-दादी के साथ रहने का फैशन तो कब का आउट-डेटिड हो गया तो हमारे जैसों के किस्से बेचारे बच्चे कहाँ से जाने| ”
उनकी बातें गौर से सुनने के बात जब हमने एक बार फिर उनके चेहरे को देखा तो तो हमें तुरन्त उनकी बात पर विश्वास हो गया | बचपन से तेनालीराम, बीरबल आदि के किस्से सुनते -पढते आये हैं इसलिये ऐसा लगा कि पहचानने में गलती कैसे कर सकते हैं | हमने स्वभाव- वश तुरन्त अपना अगला सवाल उनकी तरफ दागा, “हे चतुर-चपल मनुष्य, आपका यहाँ आने का प्रयोजन?
इस पर परम ज्ञानी, परम चपल तेनालीराम जी एक फीकी मुस्कान चेहरे पर लाकर बोले कि- कल ही मैंने और मेरे मित्र बीरबल ने एक विज्ञापन देखा जिसमे एक जापानी एनिमेशन क्म्पनी ने प्रसिद्ध भारतीया चरित्रों को एनिमेट करने के लिये उन्हें आडिशन के लिये आमंत्रित किया था | हमने सोचा नयी पीढी के बच्चों से जान-पहचान बढाने का सही मौका है ,सो चले आये | पर यहाँ दाव इण्डियन क्रिकेट टीम ले गयी, वर्ल्ड- कप हारने के बाद किसी को भी उनसे बढे कार्टून नज़र नहीं आते तो हमारे जैसों की क्या बिसात |खैर बीरबल जी को तो अपनी वाक्-पटुता के कारण एक एनिमेटेड टॉक-शो में काम मिल गया, हमें ही अपना सा मुँह लेकर वापसी की गाडी पकडनी पडेगी |
अपने प्रिय पात्र को यों गुमनामी के कारण उदास देखकर हमें बेहद कष्ट हुआ |फिर हमने सोचा कि टीवी के कार्टून वर्ल्ड में इस पात्र को भले ही जगह ना मिली,लेकिन हमारे ब्लॉगर वर्ल्ड के कम्प्यूटर महारथी जरूर इस दिशा में कुछ कर सकते हैं इसीलिए इस साक्षात्कार का शब्दशः वर्णन हमने यहाँ लिख डाला |शायद हम तेनालीराम के किस्से इन्टरनेट पर ही पढ -सुन सकें |

निराले रंग

रंग भी बहुरूपिये से रंग बदलते हैं,
कभी चटख, कभी बदरंग लगते है|

पुरानी किताब की नयी ज़िल्द में,
बन-ठन कर कितना इतराते हैं|

माँ की सन्दूक की साडियों में,
तहों के बीच फीके से लगते हैं|

पन्ना दर पन्ना अखबार में,
खबरों में बिन-बात ही उलझते हैं|

बारिश में धुल गयी दीवारों में,
चौबारे के साथ गीत गुनगुनाते हैं|

दरवाज़ों पर उग आये कुकुरमुत्तों में,
मुण्डेर की काई से कोने में झगडते हैं|

नुक्कड की बूढी दादी के सिंगार में,
माथे की कुमकुम बन चमकते हैं|

यादों की चादर में लगे नये पैबंद में,
मूक रह कर भी कहानी गढते हैं|

रंग भी बहुरूपिये से रंग बदलते हैं,
कभी चटख, कभी बदरंग लगते है|